Tuesday, 21 October 2014

विष्णुमय जग वैष्णवांचा धर्म

विष्णुमय जग वैष्णवांचा धर्म ।
भेदाभेदभ्रम अमंगळ ।।१।।
आईका जी तुम्ही भक्त भागवत ।
कराल तें हित सत्य करा ।।ध्रु .।।
कोणा ही जिवाचा न घडो मत्सर ।
वर्म सर्वेश्र्वरपूजनाचें ।।२।।
तुका म्हणे देहाचे अवयव ।
सुख दु:ख जीव भोग पावे ।।३।।
हजारों वर्षांपासून समाजातील उच्च-नीच, स्पृश्य-अस्पृश्यादि भेद मिटवण्यासाठी सर्व संत, समाजसुधारक, पुढारी इ. विचारवंतांचे अखंड प्रयत्न सुरू आहेत. पण हिंदू या सहिष्णू, सर्वसमावेशक धर्माचे यथाविधी पालन करणारे आपण हिंदू विचारवंतांच्या या प्रयत्नांना कितपत प्रतिसाद देत आहोत ? खचितच बिलकूल नाही. जातीजातींमध्येच होणारे रोटी-बेटीचे व्यवहार हेच सत्य उघड करतात की आजही आपण त्या सर्वत्र समान रुपाने व्यापलेल्या ईशतत्वाला न समजता केवळ वरचा भेदच पाहण्याचीच हुशारी मिळवली आणि जोपासली आहे. आजही दुसऱ्या जातींविषयी मत्सर, आपल्याच जातीच्या लोकांना मतदान करणं, इतर जातीत मुलगी देताना पालकांचे धाबे दणाणणे, इतर जातीचा म्हणून गुरूच्या ठिकाणीही भेद पाहणे इ. घटना घडतच आहेत. पण संत काय म्हणतात, त्याकडे आपले लक्ष आहे का ? चला पाहू तर संत तुकोबा यावर काय म्हणतात.

"सर्व कणाकणांत विष्णूच वास करत आहे, हाच आम्हां वैष्णवांचा धर्म आहे. मूळात विष्णू या नावाचा अर्थच आहे की कणाकणांत वास करणारा तो. म्हणूनच भेदाभेद आम्हाला अमंगळ, त्याज्य झाले. माझ्या हृदयातला विष्णू तो खरा आणि तुमच्या हृदयातला विष्णूही तोच. मग भेदाला जागा उरतेच कुठे ? वरवरची मायिक भिन्नता तर भ्रम आहे. अंतरीची एकरुपता हीच शाश्वत आहे. विश्वास नाही बसत तर भागवत, उपनिषद, गीता, वेद चाळून पहा आणि या शाश्वत सत्यावर विश्वास ठेऊन आपलेच हित करून घ्या. त्वरा करा. अहो, देहादेहात असा ईश्वर व्यापून असता त्याची पूजा करावयास कुठे दूर जावयास नको. कोणत्याही जीवाचा मत्सर करू नका, त्याच्या ठिकाणी भेद ठेऊ नका, मग झालीच की ती सर्वेश्वराची पूजा. आपण सारे एकाच देहाचे अवयव आहोत. त्या परब्रह्माच्या विराट रुपाचे अंग आहोत. सर्वांना सुख-दुःख सारखीच आहेत. मी सुखात आनंदतो, तसेच तुम्हीही सुखात आनंदतात, मी दुःखात रडतो, तसेच तुम्हीही दुःखात रडतात. मग भेद तो कसला ? हे समजून इतरांचे अश्रू पूसा, इतरांना सुख वाटा, ईश्वराची ओळख करून द्या, वैदिक धर्माची ओळख करून द्या. हीच त्या सर्वेश्वराची पूजा आहे."

असे असताना आपण केवळ जातीवरून एखाद्या व्यक्तिला उच्च-नीच लेखणे, जात पाहून रोटीबेटीचे व्यवहार करणे, जात पाहून मतदान करणे, जात पाहून गुणगौरव करणे इ. सर्व भेदात्मक क्रिया त्या सर्वेश्वराची पूजा होतात की अपमान हे तुम्हीच तुमच्या मनाशी ठरवा आणि तसे वागा. देवाने सर्वांना कर्माचे स्वातंत्र्य दिले आहे.

Tuesday, 19 August 2014

सगुण और निर्गुण ब्रह्म


सगुण और निर्गुण ब्रह्म
 सृष्टीउत्पत्ती के पूर्व ब्रह्म को जाननेवाला न कोई था, ना ब्रह्म को परब्रह्म कहनेवाला कोई था | क्यों की परब्रह्म को पर कहनेवाला अपर कुछ था ही नही | परंतु सृष्टीउत्पत्ती के साथ एक ही परमतत्त्व परा और अपरा सृष्टी में अभिव्यक्त हुए | परा, अपरा सृष्टी के नियंत्रण हेतू वही परमतत्त्व परात्पररुप में उसी परा, अपरा प्रकृति में स्थित रहता है, ठिक उसी प्रकार जैसे कोई सूत्र मोतियों की माला में मोतियों को गुँथे रहती है | परा प्रकृति और अपरा प्रकृति को व्याप्त जो परमात्मतत्त्व है उसेही हम निर्गुण ब्रह्म कहते है , क्युंकी वह सूक्ष्म-स्थूल से परे हेै , दृश्य अदृश्य से परे है , सबमें होकर भी ना होने जैसा है | वही परमेश्वर है, जो कण कण में स्थित होकर कण कण को नियंत्रित करता है, हर जीव में स्थित होकर जीव  के कर्मों का लेखा जोगा रखता है , पवित्र जीव में स्वयंभू होकर कार्यरत होता है, वही यह निर्गुण परमेश्वर है |
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सृष्टीउत्पत्ती के पश्चात जब मनुष्य प्राणी निर्माण हुवा, तब वह तत्कालीन अन्य प्राणीयों की तुलना में अधिक अकलमंद, जिज्ञासू और ज्ञान की ओर आकर्षित होनेवाला था | वह अपने आजूबाजू हो रहे नित्य परिवर्तन को देख रहा था | कही ऋतू बदल रहे थे, तो कही प्राणी जन्म ले रहे थे, तो किसी ओर प्राणी मर रहे थे, इन सारी चीजो पर उसका कोई नियंत्रण नहीं था | वह सोचता था की कौन है इसके पिछे | यह किसी की करनी है या कोई व्यवस्था की यह सब परिवर्तन हो रहा है | यदि योजना है तो किसकी ? और व्यवस्था है तो किसकी ? यदि यह प्रकृति की योजना, व्यवस्था है, तो प्रकृति की योजना, व्यवस्था किसने की ? परिवर्तन तो प्रकृति का स्वभाव है , तो प्रकृति का मूल स्वभाव क्या है जहाँ से इस परिवर्तन की शुरूवात हुयी और अंत होगा ? उसकी सोच ने उसे किसी अनामिक शक्ति पर विश्वास रखने हेतू बाध्य कर दिया की कोई है जो इस परा-अपरा प्रकृति से परे है , जो इस प्रकृति का नियंता, स्वामी या कहे तो मूल स्वभाव, स्वरुप है | उसी अनामिक शक्ति को वह परमेश्वर कहने लगा और उस परमेश्वर को प्रार्थना करने लगा की , 'हे भगवन्, आप कौन हो, कैसे हो, आपका स्वरुप क्या है, आपकी व्यवस्था क्या है, आपकी हमसे कोई अपेक्षा है क्या, हम इस प्रकृतिके परिवर्तन को स्वीकार करे या परिवर्तन का विरोध करे, इससे छुटने का क्या उपाय है ? हे भगवन् आप ही हमारे प्रश्नों का समाधान करे, क्यों की आप ही इन सवालों का निराकरण करने हेतू समर्थ है |' तब ईश्वर ने अत्यंत कृपालु होकर अपने भक्तों को अपने स्वरुप की पहचान कराने स्वयं प्रकट होने का निर्णय लिया | परब्रह्म पुनः ॐकार रुपमें प्रकट हुवा | ॐकार नाद से प्रकट हुए शब्द | वे शब्द थे परमात्मा के | शब्दों में अर्थ था परमात्मा का | वही शब्द आगे जाकर वेद कहलाए | वेदों में क्या था ? वेदों जीव-शिव का ज्ञान था, ज्ञान-विज्ञान था, कर्मयोग-ज्ञानयोग-ध्यानयोग-भक्तियोग इ समस्त विश्व का ज्ञान उन वेदों में समाया हुआ था | इन्हीं वेदों में उस अनामिक शक्ति ने अपनी पहचान परब्रह्म नामसे करायी, इसिलिए हम उस परमात्मा को परब्रह्म नामसे जानते है | यह परमात्मा का निर्गुण, निराकार, अव्यक्त, अक्षय रुप है, जिसे हम निर्गुण परब्रह्म कहते है |
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वेद प्रगट हुए परंतु सामान्य अज्ञानी मनुष्य की आकलनशक्ति उन वेदों को ग्रहण नहीं पायी | इस बात का खयाल उस परमात्मा ने पहलेसे किया था और यही कारण है की उस समय वेदों के रुप में प्रकट होने से पहले ही  परमात्मा ऋषी मुनीयों के रुप में प्रकट हो चुका था | जी हाँ, परमात्मा मनुष्य देह में, एक नहीं अनेक देहों में अवतरित हो चुके थे और जब वेद प्रकट हुए तो उन्हीं ऋषी-मुनियों से वेदों को ग्रहण कर , कंठस्थ कर लोगो तक पहुँचाने का कार्य किया | ऐसे ऋषी-मुनीयों के, राजर्षीयों के रुप में परमात्मा ही अवतरित हुए और होते रहेंगे, इस परमात्मा के रुप को सगुण परब्रह्म कहते है | आज भी परमात्मा सगुण रुप में अवतरित होते है, कहीं ऋषी-मुनीयों के रुप में, कहीं संतों के रुप में , कहीं लोकनेता के रुप में वे अपना कार्य कर रहे है | धर्म संस्थापना और अधर्म का नाश यही सगुण ब्रह्म का प्रयोजन होता है | श्रीराम से लेकर आज विवेकानन्द, सावरकर तक सभी महात्माओं ने यहीं कार्य किया, क्युं की इनका जन्म ही महानतम कार्यों के लिए हुआ था , इनमें ईश्वरी अंश विद्यमान था | हम कितने भाग्यवान है की परमात्मा न केवल सृष्टी का निर्माण करता है अपितु हमारे साथ हमें जीवन जिना सिखाता है, अधर्म से युद्ध करना सिखाता हैै और जीवनरुपी बंधन से मुक्त होना सिखाता हैै | जिस प्रकार खाने के लिए धान्य निर्माण किया, उसी प्रकार हमारी मुक्ति हेतू सगुण परब्रह्म कि योजना उसी परब्रह्म ने की हुयी है | हमें सिर्फ उस सगुण ईश्वर, अर्थात गुरू को शरण जाकर ज्ञान ग्रहण करना है, फिर सहज ही हमारी नांव भवसागर के पार लग जाएगी | जय श्रीराम | जय श्रीकृष्ण |